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अमरनाथ की अमरकथा - एक व्यंग्य

नितांत अन्धकारमय रात्री भी समाप्त होती है, सो यह रात भी हुई। नेताजी प्रसन्न हुए। कल की रात ज़रा मुश्किल से गई। कश्मीर में गोली चली थी। कुछ हिन्दू जो अमरनाथ दर्शन के लिए निकले थे, शहीद हुए। बड़के नेताजी सुबह सुबह आने की निर्देश दिए थे। तीर्थयात्रा एंगल हिंदू हृदय सम्राट (प्यार से हम उन्हें हिहस पुकारते हैं) को अत्यधिक कठिनाई देता था।

मीटिंग समय पर आरंभ हुई। हिहस शाँत थे, विचारमग्न थे।

'हम्मम..' - हिहस बोले

मंत्रीगण उत्साहित हुए, प्रफुल्लित हुए, मानो चकोर को चाँद के दर्शन हुए।

"गृहमंत्री जी, इस देश में तो रहना ही कठिन हो गया है"- हिहुस बोले

गृहमंत्री राजा महाराज जिन्हें सब प्यार से 'राजमा'कहते थे,की नज़रें कलाई से उठकर हिहस की ओर बढ़ी, मानों उलाहने से कह रही हों- 


'हमें का पता, काहे सबके सामने बेइज़्ज़ती कर रहे हो।'


राजमा बोले-


'हिहस, बाक़ी जगह ठीक है, कश्मीर की ही समस्या है, देश में रहने में कोई समस्या नहीं है।'
'अरे हम हमारे रहने की बात कर रहे हैं।' हिहुस झुँझलाए। 'रात भर हमारे ही समर्थक गरिया रहे हैं। आप को देखना था अन्य देशों में लोग कितना स्नेह करते हैं, और यहाँ यह? ऐसे भी कोई समर्थक होते हैं?

राजमा ने अपने चरणों को निहारा, और चिन्ता में मग्न हुए। दो सप्ताह हो गए पेडिक्योर नहीं हुआ। करूण ठीक कहता है, सब स्टाइल की बात है, सब चैनल वाला उसी को बुलाता है।इसी से उसको एक के बाद दूसरा मंत्रालय मिल रहा है। मेनिक्योर-पेडिक्योर के बिना संभवे नहीं है। राजमा जी ने पलकों के किनारे से सदाबहार करुण जी को देखा। हृदय में ईर्ष्या का बाण सा उतर आया।

'राजमा जी, कुछ तो कहें, क्या जवाब दें जनता को?'

राजमा जी विचारोपरांत बोले-


'श्रीमन, बहुधा संकट में ही अवसर छुपा होता है। जब तक विपक्ष के राजकुमार आत्ममंथन करते रहेंगे, हिंदु वोटर तो अपना ही है। क्यूँ ना हम वामपंथियों के समर्थन में सेंघ मारें?'
हिहस तनिक शाँत हुए, हालाँकि उन्हें राजमा जी की बात ठीक से समझ नहीं आई। किंतु उन्हें 'वोट' 'वोटर' जैसे शब्दों से भरे वाक्य संबल देते थे। उन्होंने मित्र एवम् सहयोगी, जिन्हें सब स्नेहवश 'भई वाह'कहते थे, उनकी ओर देखा।

'भई वाह, किंतु यह किस प्रकार होगा?' भईवाह बोले

राजमा जी माथा खुजाने लगे, सोच में पड़ गए। करूण की काटने के चक्कर में बोल तो गए, किंतु योजना थी नहीं। हिहस और भईवाह के प्रश्नों का उत्तर ऐसा तो था नहीं जैसे गृह मंत्रालय चलाना। योजना चाहिए। मस्तिष्क ४८६ कम्प्यूटर की भाँति कार्यरत था। साक्षात विचार-विमर्श में यही समस्या है। साक्षात ना होने के अनेक लाभ हैं, जैसे किसी चैनल का स्टिंग उठा कर ऐसे दिखाओ मानों मानव नें गुरूत्वाकर्षण जैसा कोई सिद्धांत खोज लिया हो। जनता को लगे कि काम हुआ, चैनल को लगे कि नया मित्र मिला सत्ता में। राजमा जी को महसूस हुआ कि सब आँखें उन्हें ही तक रही हैं।

'हम सोचते हैं हम कश्मीरियों के पक्ष में बोलें।'

'कश्मीरियों के पक्ष में?' भईवाह सोचने लगे, उन्होंने आई-पैड पर उस राज्य का धार्मिक वोटर वितरण देखा जहाँ अगला चुनाव था।

इधर भईवाह उहापोह में थे कि पीछे की पंक्ति से सोशल मीडिया अध्यक्ष, चकित चक्रम बोले- 'इंडिया विथ पाकिस्तान' 'भगवा और गजवा' ट्रेंड कराएँ? कश्मीरियों का साथ देने का यही साधन है। 'नादान टीवी' चैनल वाले चकित होकर समर्थन में आ जाएँगे।'

'ये तो टू मच क्रांतिकारी हो जाएगा। वामपंथी तो वैसे ही पलटू हैं। किसी के सगे नहीं हैं।'
संचार मंत्री में नव-उत्साह का संचार हुआ। ऐसी स्लोगन-वर्दी बातें उन्हें बहुत भाती थी। जहाँ उनका नेटवर्क नहीं पहुँचा, वहाँ भी तीन वर्षों में स्लोगन पहुँच गए।

मंत्रीजी बोले- 'कोई ऐसा सगा नहीं, जिसको इन्होंने ठगा नहीं'

हिहस खिन्न मन से बोले- 'यह कविता का अवसर नहीं है। जनता उद्वेलित है।'

'हिहस, आप जनता ज़्यादा ही वेटेज दे रहे हैं। जनता रोटी पानी में मगन है, दो चार दिन बोल कर आगे बढ़ लेगी। इस देश में सौ-दो सौ मरने से कुछ नहीं होता, छह-सात में क्या होगा? रहा वामपंथियों का, हमारी पुलिस तो अब तक कन्हैया कुमार एँड फ़्रेंड्स को पालपोस कर बड़ा कर रही है, तब भी लेफ़्ट को चैन नहीं है। इतने दिन में तो राष्ट्र द्रोह में कर्नाटक की कांग्रेस सरकार बड़े पत्रकार को भी अंदर कर देती। निंदा करिए, काम पर चलिए!' - राजमा जी बोले और उत्साह-वर्धन के लिए संचार-मंत्री की तरफ़ देखे।

चकित चक्रम को इस तरह किनारे किया जाना पसंद नहीं आया। क्या उनका दिल नहीं कि वो नादान टीवी के स्टूडियो में जाएँ। क्या युवा हृदय की अभिलाषाओं का कोई अर्थ नहीं? क्या युवा वैचारिक नेता नही बन सकता, संपादकीय नहीं लिख सकता, सुन्दर महिलाओं से डिबेट नहीं कर सकता? 

बोल पड़े - 

'क्यों ना हम आनलाइन पोल चलाएँ- क्या हमें आतँक का मुँहतोड़ जवाब देना चाहिए? ट्रेंड होगा, जनता सवालों में खो जाएगी।'
'ये भी कोई प्रश्न हुआ? इसका उत्तर सब जानते हैं।'

'हम उनसे सुझाव माँग सकते हैं।हम उसपर कुछ पुरस्कार भी रख सकते हैं। प्रविष्टियाँ डिजीटल हस्ताक्षर के साथ माँगते हैं। डिजीटल इंडिया का प्रचार भी हो जाएगा'

'उसमें समस्या है। कोई सरकारी डिजीटल सिग्नेचर संस्था 
वाली  है  ही नहीं ।"

- संचार मंत्री नजरें चुराते हुए बोले 

हिहस की भृकुटि तनी।

'काहे? 
ये भी ग्रामीण इंटरनेट जैसा चल रहा है?आप बस लोगों का इस्तीफ़ा मांगें '  


'सरकार की कोशिश, अफ़सर-तंत्र की साज़िश' - संचार-मंत्री एक नए स्लोगन के पीछे जा छुपे

'
खैर ,मुद्दे से भटकें नहीं। कड़ी कार्यवाही तो की- आतंकियों को मारा, सर्जीकल स्ट्राइक्स की- और क्या कठोर कार्यवाही करें? भक्त अभक्त से अब वीभत्स हुए जा रहे हैं।"


मार्गदर्शक मंडल की तरफ़ से गला खँखारने की आवाज़ हुई, सब उधर मुड़े।

"ये सब कास्मेटिक कार्यवाही है, जनता ऐसा मान रही। आप कश्मीर में 
पैदल सिपाही गिरा रहे हो, उनके जनरल कान्फ्रेन्स में भाग ले रहे हैं, पुस्तक छाप रहे हैं, विदेशी विश्व-विद्यालयों में व्याख्यान दे रहे हैं। पिछले वर्ष दस मरे थे, इस वर्ष पंद्रह, ईश्वर नें चाहा तो अगले वर्ष बीस मरेंगे, उससे क्या होगा? कठपुतलियाँ गिर रही हैं, संचालक मर्सिडीज़ में निर्बाध घूम रहे हैं, उससे क्या बनेगा? रक्तबीज हैं ये, एक से दो, दो से चार, चार से सोलह बनेंगे। बिना बौद्धिक समर्थन के आतँकी गली के गुँडे से ज़्यादा कुछ नहीं है। मीडिया है, बिका हुआ है। समानांतर मीडिया लाइए।" 


- बुज़ुर्गवार नें करूण और राजमा की ओर देखा। राजमा पुन: पेडिक्योर की चिंता में खो गए थे, करूण की दृष्टि मानो छत चीर कर पिछले सप्ताह छोड़े हुए उपग्रह को ढ़ूँढ़ रही थी। चक्रम  ने बुज़ुर्गवार को लेकर नए व्यंग्य बनाने का निर्देश व्हाट्सएप दल को फ़ोन में टाइप किया। चिंतित पार्टी संस्थापक बोले-

'आप बौद्धिक समर्थन खींचें, विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बदलें। अख़बारों में राष्ट्र-विरोधी लेखों पर क़ानूनी कार्यवाही करें। अब ये तो न कहें कि बिना न्यूज़ चैनल के स्टिंग के आपको इस आतंकवाद-समर्थक 
धन -तंत्र का ज्ञान नहीं है। अगर ऐसा है तो आपका सुरक्षा तंत्र मिथ्या है। ऐसा नहीं है तो राजमा जी बताएँ कि कार्यवाही क्यों ना हुई?"


राजमा जी कुर्सी में हिले, मन में विचारे- 'इन्हें तो कोई चैनल बुलाता नहीं है, मौक़ा मिला नहीं कि बुढ़ऊ बोले ही जाते हैं। वानप्रस्थ का इन्हें कुछ आईडिया ही नहीं है।'

संस्थापक महोदय नें फिर गला साफ़ किया-


'देखो, दिशा स्पष्ट ना होने से ये जो अँधेरें में खड़ा शत्रु है, प्रोत्साहित होता है; रक्तबीज का रक्त बोता है और नए राक्षस तैयार करता है। तुम हर देश को पाकिस्तान का समर्थन बंद करने को कहते हो, ख़ुद उससे शिकायत भी करते हो तो नाम नहीं लेते। काहे? गाँव की औरत हो जो पी कर मारने वाले पति का नाम नहीं लेती?
हिहस नें तीक्ष्ण दृष्टि से उनकी ओर तका।

राजमा ने वातावरण पर उतर आए तनाव को समझा. बोले-

"सबको साथ लेकर चलना होता है, आपके समय जैसा नहीं है। सबसे दुश्मनी ले कर सत्ता नहीं चलती। लोग तो हर बात पर हिंसक हो जाते हैं। हमारी तो संस्कृति ही भीड़ की हिंसा की हो गई है।"
करूण ने राजमा को देखा, राजमा ने करूण को। सब सुना-सुना सा लग रहा था। कहाँ? शायद कल रात की नादान टीवी पार्टी में। भईवाह भाषा की समानता को तुरंत कैच कर लेंगे सोच कर राजमा नें ख़ुद को सँभाला।

"हमको कोई इन हिंदुवादियों नें नहीं बनाया है। सुबह शाम मैट्रो और बसों की पंक्तियों में खड़े रहते हैं सोचते हैं राष्ट्र इन्हीं से बनता और चलता है।अरे भाई, घर के पास भी तो मंदिर होता है, सरकार 
ही चलाती है, वहीं दो अगरबत्ती जला लो। नहीं, ये अमरनाथ ही जाएँगे।"


"किन्तु इनकी भावनाओं का सोचना तो होगा?" हिहस बोले

"हिहस, कृष्ण  
भले कह कर चले गए किंतु कर्म इनके हिस्से नहीं है, मिथ्याभाषण है बस। आप चिन्ता ना करें। इनकी आवाज़ भी सीमित है, उसका दायरा भी। वाम वाले तो हमेशा इन्हें गाली-गुल्ला कर के शाँत करा देते हैं, हम ही भाव दिए रहते हैं। वैसे भी हिंदुवाद अपने आप में छद्म सोच है। यह है क्या- हिंदी-अहिंदी, किसान-व्यापारी, ब्राम्हण-ठाकुर-दलित, हिंदू-सिक्ख-बौद्ध-जैन- ऐसे बिखरे हुए मानव समूह को आप क्या ख़ुश कर सकेंगे? दूसरी ओर स्वार्थ से संगठित संघ है। कल एक महिला ने कहा कि अब आँतंकियों को उत्तर देना होगा। मैंने कहा हर कश्मीरी आतँकवादी नहीं है, और फिर तो सब तरफ़ वाह-वाह। और फिर जो वाम वाले पिले हैं, ट्विटर से भगा दिए, फौजी की पत्नी को। आप सोच नहीं सकते, निर्मम हत्याओं के अगले दिन गृह-मंत्री को बौद्धिक वर्ग का ऐसा समर्थन।दक्षिणपंथी क्या खा कर इसका मुक़ाबला करेंगे ? वाह!'


बुज़ुर्ग नेता धीरे से बोले- "किन्तु उस महिला ने कश्मीरी तो बोला नहीं ?"

"अरे, आप समझते नहीं हैं। 
उसने नहीं , हमने तो बोला, तभी तो हुई वाह वाह। कश्मीर और कश्मीरियत- यही चल रहा है आजकल"


बुज़ुर्गवार फिर बोले- "जब सब धर्म को निकाल दिया तो क्या बची कश्मीरियत?"

भई वाह बोले- 


'हमने ट्रेंड देखा। वह महिला किसी सैनिक की पत्नी और लेखक है। फिर भी, हिहस, ध्यान दें, उसने ट्विटर से पलायन किया, क्यों? क्योंकि उसने कश्मीरियत का अपमान किया।उसकी नौकरी पर ख़तरा, क्यों? क्योंकि उसने कश्मीरियत का अपमान किया। राजमा जी कश्मीरियत की रक्षा हेतु खड़े हुए, उनकी चहुँओर जयकार। कश्मीरियत ही रामबाण है। दैट इज़ द वर्ड, वी गो विद इट।

चक्रम, आप पोल कराएँ और बताएँ कि क्या हम हम केरलियत और बँगालियत का टेप उन क्षेत्रों के परेशान करने वाले लोगों के मुख पर लगा सकते हैं जहाँ राज्य में सरकार हमारी नहीं किन्तु लोग ज़िम्मेदारी हमारी मानते हैं? जब यहां चल गया तो वहां क्यों नहीं, यहां तो राज्य सरकार भी हमारी थी '

राजमा जी- 


'कल के ट्वीट के बाद से प्रगतिशील वामपंथी समुदाय में हमारा भारी स्वागत हुआ। इस नवीन वामपंथी सौहार्द की आँधी में सब सुरक्षा वियवस्था की विफलता का प्रश्न,विदेशी, नक्सल-समर्थक पत्रकारों का राजनीतिक प्रश्रय, ऐसे सब प्रश्न हवा हो गए। हिहस कहें तो वरदराजन जी को सुरक्षा सलाहकार, सुश्री अयूब को विदेश सचिव और अब्दुल्ला जी को नेशनल इंटीग्रेशन काउँसिल का अध्यक्ष नियुक्त किया जाए। हम सोच रहे थे नव-सिंचित मित्रता का लाभ लेने में किंचित संकोच ना करें। सोचते हैं अमरनाथ घटना में एक कश्मीरियत कथा घुसेड़ दें। बस -ड्राईवर मुसलमान था।'

आख़िरी वाक्य तक राजमा जी के शब्द फुसफुसाहट बन गए।

हिहस आगे को झुके और उसी अँदाज में फुसफुसाए- 'तो'?

राजमा मुस्कुराए- 'यही तो तुरूप का पत्ता है'

हिहस- 
'यह तुरूप का पत्ता है यह सुरक्षा व्यवस्था की विफलता की तुरही बजाना चाहते हैं? मसलन बस परमिट के बिना, अवधि के पार क्यों चली?


राजमा बोले- 'बस पार हो रही थी। किनारे से गोली चली। ड्राइवर वीरतापूर्वक गाड़ी भगाता निकल आया और उसने तीर्थयात्रियों की रक्षा की।'

हिहस की समझ से परे बात निकल रही थी। करूण कूदे।


'भाई, आप यदि गाड़ी चला रहे हों, किनारे से गोली चले तो आप भी सीधा गाड़ी भगाएँगे ही। इसमें क्या वीरता?'
'आप तो समझते हैं करूण भाई, चैनल कहे भीरूता तो भीरुता, वीरता तो वीरता। और ना सिर्फ़ वीरता, कश्मीरियत भी, क्योंकि ड्राइवर मुसलमान था, सवार हिंदु। वैसे कश्मीर में हिंदू बस में ही दिखते हैं।''लेकिन वो ड्राइवर तो गुजराती है'

'अरे, कौन देखता है, नेरेटिव मस्त बनता है- कश्मीरियत।'
हिहस- "कश्मीरियत तय हुआ। कल के घटनाक्रम का एक उत्तर- कश्मीरियत, चाहे वह आज की राजनीति की तरह खोखला क्यों ना हो, मुक्ति इसी से होगी। ज़्यादा कष्ट हो  
तो राजमा जी और करुण जी के नादान टीवी वाले मित्र मदद करेंगे।"


भाई वाह अपने फ़ोन को अत्यंत संतुष्टि के साथ देखते हुए बोले-
'हिहस, उनके संपादक ने आभार भेजा है आपको, कि मिथ्या समाचार पर मिथ्या प्रदर्शन पर अपने सच में संज्ञान लिया। आपको लाल सलाम भेजा है।
हिन्दु हृदय सम्राट ने सभा-समाप्ति का निर्देश दिया।



"सभा विसर्जन"

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